बयाबाँ

ग़ज़ल

तुम नहीं तो इस बयाबाँ ज़िन्दगी का क्या करूँ ?
रूबरू है हर ख़ुशी,पर अब ख़ुशी का क्या करूँ ?

इक फ़रिश्ते की क़बा ओढ़ी है औरों के लिए,
पर जो दिल में क़ैद है,उस आदमी का क्या करूँ ?

शम्स की दस्तक पे देखो खिल गया बाग़-ए-तमाम,
जो खिले तेरी शुआ से उस कली का क्या करूँ ?

हुस्न है इक सिम्त और, इक ओर है मेरी ग़ज़ल,
देख तुमको जल रही इस शायरी का क्या करूँ ?

कहकशानेदिल में अब तक लफ़्ज़ तेरे हैं रवाँ ,
जिसको कहते लब रुके,उस अनकही का क्या करूँ?

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