“””””””” महफ़िल हो या हो मयखाना “”””””””

“””””””” महफ़िल हो या हो मयखाना “”””””””
दास्ताँ है कुछ अंजानो की, जिनको ये जग ना पहचाना |
मिटती हस्ती, फिर भी रंगत में, महफ़िल हो या हो मयखाना ||(1)

महफ़िल हो या हो मयखाना, बनता है दीवानों का अफ़साना
जख्मों-गम हो चाहे कितने भी, पड़ता है दिल को बहलाना |
छलकाए ग़म का, प्याला भर -भर के, नापे हर दर्द का पैमाना
होते हर दर्द में शामिल हसकर, गम का रिश्ता ना अंजाना |

मुज़रिम ना हैं, फिर भी हैं गिरफ्त, कसूर था होना दीवाना |
मय आँखों का, घूँटों में उतरता, महफ़िल हो या हो मयखाना ||(2)

शिकवा ना करते अपने दर्द का, एक नाम छुपाये, गम हैं सेहते
थामना होगा दामन दर्द का, छिल उठेंगे लब्ज़, नाम केहते |
राग अलापे अपने मन का, गुंजन भंवरों सा करते हैं
शायद किसी गुल पर थे मचले, अब सिसकियो से शब तर करते हैं |

ग़मज़दा समा में ख़ुशी समेटे, दें गम को हँसी का नज़राना
करते ना गिला किसी बेहया का, महफ़िल हो या हो मयखाना ||(3)

बतलाते जब हैं दास्ताँ अपनी, सहमे हर रोम, रहे मृत से पड़े
अश्क़ हुए दर्रे महफ़िल के, चीखे संग मयखाने के ज़र्रे |
हुआ चकित सा मैं, जाना जो अभी, बोतल के नशे में डूबा ना कोई
प्याला तो उस मरहूम का है, जो अरमान जगा, है जा सोयी |

हुए खाक सही, पर मिटे नही, रुख़सत ना हुआ ये परवाना |
हर घूंट निजाद-ऐ-ग़म का है, महफ़िल हो या हो मयखाना ||(4)