बाबुल तेरा आंगन

एक छोटी नन्ही कली हूँ मैं,
तेरे आंगन में खिली हूँ मैं,
क्यूँ बाबुल तेरा आंगन छोड़ना पड़े,
क्यूँ दूसरे आंगन को खिलाना पड़े,
जब आती हूँ छम छम चलती हुई,
घर आंगन को महकती हुई,
क्यूँ समझे बाबुल तू बोझ मुझे,
क्यूँ मार डाले कोख में मुझे,
क्यूँ खिलने ना दे मुझे |
करती हूँ रिश्तों का मान,
दिलाती हूँ तुमको सम्मान,
फिर भी ना मिले बाबुल तेरा प्यार मुझे,
तरसती रहती हूँ बाबुल के आंगन को,
प्यार को, लाड को, दुलार को,
क्यूँ समझे बाबुल तू बोझ मुझे,
क्यूँ भेजे दुसरे आंगन मुझे,
एक छोटी नन्ही कली हूँ में,
तेरे आंगन में खिली हूँ में |

बी.शिवानी

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