माथे पर

माथे पर थी सिलवटें
बाल नहीं थे बनाये,
आँखें थी पथराई,
थी टिकटिकी लगाये,
देख रही थी दरवाज़े की ओर,
बैठी थी ऐसे जैसे अभी कहीं जाना है,
आएगा उस दवाज़े से कोई,
गर हट गई वहां से,
तो रह जायेगी यंही,
उन चार दीवारो में कैद,
सोच रही थी वो आएगा,
आ कर कहेगा “माँ “
तेरे बिन घर सुना है,
तेरा पोता तुझे याद करता है,
तेरी बहु ने तुझे लाने को कहा है,
यह सोचते ही आँखों में,
आँसो भर आए,
वो पथराई आँखें नम हो गई,
बालों को ठीक करके,
फिर से आँखे दरवाज़े पर,
टिकटिकी लगाये बैठ गई |

बी.शिवानी

Leave a Reply