वाह तेरे क्या कहने,,,,,,,,,,,,,,

||यूं ही कम ना थी जिंदगी की उलझने
उस पर भी ये दिल दिया तेरी खुदाई के क्या कहने||
रोता हुँ मैं बिलखता हुँ मैं
हर आह मे बस यही कहता हुँ मैं
||हर दर्द कबुल किया अब कुछ बचा ना सहने
ईंम्तेहां तुने खूब लिया तेरी खुदाई के क्या कहने||
आसां थी राहें मंज़ीले मेहरबां
बस तुही तो था मेरा निगेहबां
||तेरे ही दिये हम़राह संग लगा था चलने
उसने दोराहें पर छोड़ दिया तेरी खुदाई के क्या कहने||
फिर भी उठा मै और चलता गया
तेरी बताई मंज़ील की ओर बढ़ता गया
||कितनी आई सुबहे और शामें लगी ढलने
और तुने भी मूह मोड़ लिया तेरी खुदाई के क्या कहने||
जो भी दिया तुने सब मैने बाँट दिया
मेरा बोया हुआ भी औरो ने काँट लिया
||अब ये “विकास”की ईमारत लगी ढहने
सांसो ने भी नाता तोड़ लिया तेरी खुदाई के क्या कहने||
\\\\\ विकास /////