माँ का एक सवाल …….

अपने पुत्रों के बारे में हे वसुधा माँ,
यह कैसा सवाल कर डाला
कुछ न पूछ,
शायद मौन रह जाऊंगा
इतना साहस नहीं है मुझमें,
कि चुप्पी तोड़ पाऊं
कुछ नहीं कह पाउँगा
बिना बताये भी कहाँ जाऊं
पर, तुझे क्या बताउँगा?
क्या यही कि तेरे धर्मराज ,
का अधर्मी हो गया है व्यवहार।
मानवता कि उन गलियों में ,
छा गया है सूनापन और अन्धकार ।
क्या यही कि इस विश्व वट कि जड़ों में
जम चुका है अहम् का अधिकार।
मानव मन कि भावनाएं रह गयी हैं जीर्ण शीर्ण
भाव शून्य वातावरण में स्वार्थपरता बस विकीर्ण ।
और यह कैसे बताऊँ कि
रिश्तों की प्यारी गर्माहट ,
दूर जाने अब लगी है,
सुन आतंक की घातक आहट।
क्या मुह लेकर ये तुझे बताउँगा,
क्या तेरे सवाल का जवाब कभी दे पाउँगा?

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