***** मैं भी हूँ इश्क़ करने निकला *****

********** मैं भी हूँ इश्क़ करने निकला *************

एक बस्ती, बस्ती है यही कहीं, या है दीवानो का हुजूम
पता ना उनका, ना कोई ख़बर, होश खोये रहे होंगे घूम |
कहना उनसे बस इतना है ………………………………….

सुन लो ऐ सारे दीवानों, धुन में मस्ताने परवानो
मैं भी निकला हूँ इस राह पर, शामिल होने ऐ बेगानों |
पर पहले थोड़ा उनको देखूँ, जो मुझसे पहले इस राह पर निकले
थोड़ी तो तलब हो उनकी भी, जो ओंस बन पात पर जा फिसले |
सुने बहोत हैं इश्क़ के किस्से, हर गली में होते इसके चर्चे
गर कीमत ही नही, दीवानेपन की, दिल क्यों अपना फिर हुस्न पे खर्चे ?
हुई उम्र जवाँ, या दिल बेईमान, ज़ुर्माना इश्क़ भरना होगा
जानू मैं, बन बैठूंगा जुगनू, चमक में फिर भी, खोना होगा |
शायद मेरा दिलबर ना हो, बाकि सब के सनम जैसा
गर निकला भी तो क्या गम है, जिसे पा ना सका, उसे खोना कैसा ?

या तो कुछ इश्क़ में ऐसा है, जो बनता है बेवफाई का सबब
दर्द मिले सबको एक जैसा, दीवानो का ना कोई मज़हब |
पर कुछ तो है इस इश्क़ -ओ -जुनूँ में, महलो -मकाँ ज़र्ज़र हो जाएं
मंज़र बन जाते है ऐसे, कंधो पर उठे, कदमों पे कभी ना उठ पाए |
अब चल निकला हूँ हमदम की गली, वापिस लौटूंगा होकर फ़नाह
रोकता कदमो को तब तो मैं, जब दिल से ना चलता, मैं इस राह |
सम्भालो ऐ सारे मस्तानों, इश्क़ बड़ा ही ख़ूबसूरत मसला
बनने परिंदा गम के अम्बर का, मैं भी हूँ इश्क़ करने निकला |

कुरेदने कलम से दर्द का किस्सा, मैं भी हूँ इश्क़ करने निकला
होने शामिल दीवानों के हुजूम, मैं भी हूँ इश्क़ करने निकला ||
by Roshan Soni

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