!! यादों की अभिलाषा !!

यादों के समंदर में,
एक तिनका उड़के गिर पड़ा !
लहरों के संग डूबते लड़ते,
किनारे पे जा कही अड़ा !!

था खड़ा वह सोच रहा बस
किस ठौर मुझे अब जाना है !
या युही बस डूबते लड़ते
समंदर पार हो जाना है !!

थी अभिलाषा उड़ने की उसको
पर मन अब भी विचलित था !
जाऊ कहाँ मैं क्या करू बस,
सोच यही वह चिंतित था !!

थी नहीं उसे कुछ सूझ बुझ,
पर लड़ना उसका निश्चित था !
किया था जो प्रण उसने भी,
पाना उसे सुनिश्चित थाn!!

दृढ इरादे, हिम्मत भर खुद में
चिर समंदर की लहरों को !
जा लड़ा वह प्रेम प्रयाग से,
जहाँ जीत उसे सुनिश्चित था !!

पूरी हुई अभिलाषा उसकी,
और मन उसका उन्मुक्त हुआ,!
लड़ते लड़ते जीत मिली पर,
डूब सागर में वह विलुप्त हुआ !!

अमोद ओझा (रागी)

3 Comments

  1. Amod Ojha Amod Ojha 06/04/2015
  2. dushyant patel 07/04/2015
    • Amod Ojha Amod Ojha 07/04/2015

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