श्री राम चालीसा

गणपति का कर ध्यान मातु शारद पद वंदन |
कोशलेस रघुनाथ कृपा करिए रघुनन्दन ||
चालीसा का गान करो मिलकर सब भाई |
भरताग्रज श्री राम भगत वत्सल रघुराई ||

रघुनायक राघव राम हरे |कर सायक शीश किरीट धरे ||
रघुनाथ नमामि नमामि प्रभो |सुर पूज्य अनामय ब्रह्म विभो ||
भगवंत अनंत दिगंत अहो |गज गीध अजामिल तारक हो ||
नवमी तिथि श्रेष्ठ सुहावन थी |शुभ चैत्र सुदी अतिपावन थी ||
अति मंद सुगंध समीर बही |चहु ओर ख़ुशी अति छाइ रही ||
अति शीत न घाम न वृष्टि रही |तिहु लोक सुखाकर सृष्टि सही ||
अवतार हुआ दिन मध्य सही |शत कोटि प्रभाकर दीप्ति रही ||
नभ मंडल देव समाज जुड़ा |प्रभु दर्शन को शुभ काग उड़ा ||
गिरि छोड़ चले शिवशंकर थे |विधि संग कुबेर सुरेश्वर थे ||
ऋषिदेव उछाह उमंग खरा |मनु मोदु प्रमोदु विनोदु भरा ||
मन में मन मोदक फूटि रहे |सब भक्त सुधा रस लूटि रहे ||
सुर नाचहिं गावहिं गान करैं |अखिलेश्वर का सब ध्यान करैं ||
प्रकटे रघुनन्दन राम हरे |सुर धेनु ऋषीश्वर मोदु भरे ||
पुरवासिन्ह मोदु अपार दिए |शिशुरूप स्वरूप भुसुंडि हिये ||
रघुनंदन भ्रातन्ह प्रेमु करैं |पितु मातु हिये मन मोदु भरै ||
ऋषि गौतम नारि अपावन थी |तेहि श्राप मिला वह पाहन थी ||
रज धूलि मिली तप पुंज बनीं |रघुनंदन आनंद कंद धनीं ||
अखिलेश्वर थे पहुचे मिथिला |सिय रूप विलोकन लाभ मिला ||
अति प्रीति पुरातन प्रेम मिला |मन मानस में नव कंज खिला ||
फुलवारि तडाग सिया कमले |रघुनन्दन भास्कर से निकले ||
अँखियाँ सिय की उलझीं पिय से |अति व्यंग्य करैं सखियाँ सिय से ||
शिव चाप जहाज कठोर रहा |पितु का प्रण भी अति घोर महा ||
सिय गौरि गजानन ध्याइ रही |लखि भक्ति षडानन मातु कही ||
बरु सुन्दर सांवर तोहि मिली |वर पाइ सिया हरषाइ खिली ||
नृप राज समाज उदास महा |बलहीन महीप विदेह कहा ||
तब लक्ष्मण को अति क्रोध जगा |तन वीर भयंकर योग पगा ||
जहँ कोशल वीर प्रचंड रहे |मिथिलापति क्यों असि बात कहे ||
रघुवंश शिरोमणि राम जहाँ |अज विष्णु महेश प्रभाव तहां ||
अति जीण पुरान पिनाक महा |अति लागनि बात विदेह कहा ||
गुरु आयसु से रघुवीर चले |नहि मोदु न त्रास न रोषु भले ||
रघुनायक चाप समीप गए |दिशिकुन्जर व्याकुल कोल भये ||
सिय राम विवाह उछाह महा |तिहु लोक महोत्सव छाइ रहा ||
विधि क्रूर प्रभाव विधान ठना |वन चौदह वर्ष वितान बना ||
धरि काग स्वरूप जयंत चला |सिय चोंच चुभा शठ चाह भला ||
सर राम कराल चलाय दिये | इक नेत्र विहीन जयंत किये ||
रण में रघुवीर सुधीर डटे |दशकंधर के कर शीश कटे ||
रघुवीर सदा करुणा करते |जन रन्जन दुःख दारिद हरते ||
मतिमंद करैं विनती तुमरी |रघुवीर कृपा करिए सगरी ||
धन हीन दुखी तन छीन हुआ |मम मानस को दुःख दर्द छुआ ||
शिवदास हुआ अति दीन अहो |सुख मंदिर राम कृपालु रहो ||

राम भक्त शिवदास रच्यो रघुवर चालीसा |
पूरी होगी आस जो चालिस दिन पाठ हो ||

आचार्य शिवप्रकाश अवस्थी
9412224548

2 Comments

  1. rakesh kumar rakesh kumar 07/04/2015

Leave a Reply