“मुक्तक”- रोशन सोनी

(1) तुझको संगेमरमर केहना, ताज की सरताजी थी
दिल तेरा होगा पत्थर, ये सोच ना, ताज नवाज़ी थी ।

(2) थोड़ी सी इबादत क्या कर ली, वो खुदा बन ऐसे फरमाए
मूझसे मिलने-जुलने की खातिर, पहले जाओगे दफनाए ।

(3) मुक्तक मुख-तक आकर के भी, शोर प्रकट ना कर पाए ।
जिन कदमों ने सागर नापे, तेरे इश्क गिरे उठ ना पाए ।

(4) मेहबूब मेरा क्या दिखता है, मैं कैसे तुमको बतलाऊ
बस दुआ करो, छटे अमावस का पेहरा, दीदार-ए-मेहताब, मैं भी पाऊँ ।

(5) मेरा इश्क भी क्या रखता है रसूख़, समझ पाना इस जग की बात नही
इश्क वो ही, जिसमें खूद का ही इल्म ना हो, बिन पीए होश खोना, ये सबके बस की बात नही ।

(6) मुझको भी खुदा दे दर्द-ए-इश्क, मैं भी देखूँ दिवानापन
बस दर्द तू ऐसा ना देना, जो दर्द बने, वो ही हो मरहम ।

(7) एक दिन ही सही, कुछ कम हीं सही, कम से कम तेरे लब पर होगा
जब पूछेगा खुदा, क्या मेरा था गुनाह , तेरा चुप रहना मेरा इनाम होगा ।

(8) मुझको ना खबर, खबर क्या है, आजकल तेरे बारे में
किस्से ना-वफ़ाई करते वो फूल, जो लगे मेरे कब्र किनारे में ।

(9) ना हिन्दू की, ना मुस्लिम की, ना ही संघ और लीग की
सीचो ना इसे मरहूम लहू, ये उपवन है माँ हिन्दी की ।

By Roshan Soni

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