“””””””हिंदी का बेटा ज़िंदा है “”””””””

“””””””हिंदी का बेटा ज़िंदा है “”””””””

ऐ हिंदी से मुख फेरने वाले, इज़्ज़त खोने से डरने वाले
अपना के विदेशी कंठ लंगोट, कहते हो हिंदी, गले का फंदा है |
जितने भी भेष अपना लो तुम, भागो हिंदी से जितना दूर
मिट ना पाए माँ का अस्तित्व, जबतक ,हिंदी का ये बेटा ज़िंदा है |

परिधि काटे जिस विदेश की, तूने जो पराया राग है सीखा
इनका खुद का वजूद क्या है , इनका तो उगता दाँत, हमने है देखा |
जिस भाषा की टोपी तू पहन, अजब खेल का करे तमाशा
ब्रदर -भ्राता, मदर -मातृ और भी उसने हैं, नक़ल से सीखा |
माँ के आँचल सी मिटटी क्यों? तुझको बिलकुल ना भाति है
क्यों कहलाने पर, “देसी” , तुझको लज्जा सी आती है ?
मुझ जैसे और कितने ही सपूत, इस माँ की सेवा करते हैं
तुझ ‘से’ ना हुए, इतने बेगैरत, जो माँ को माँ ना कहते हैं |
हर्ज़ तुझे किस बात का है, मैं अबतक ये ना जान पाया
अरे ! दुनिया की खबर रखने वाला, “गूगल” भी हमतक चलकर आया |

उड़ ले चाहे कितने भी गगन, फिर भी तू यहीं का परिंदा है
तू बन विदेशी, पर केह हो देसी, तुझमे भी हिंदी ज़िंदा है |
कोई छू ना पाये माँ की इज़्ज़त, माँ की निंदा तेरी भी निंदा है
ललकार उसे, और बतला दे, हिंदी का बेटा ज़िंदा है |

By Roshan Soni

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