बचपन (Mann Kalamchee)

बचपन में जिन्दगी के इतने साज – ओ – साभान ना थे ,
नादान तो थे , मगर इतना परेशान ना थे ।

मच्छरदानी मे तारों की छाओँ मेँ खूब नींद आया करती थी ,
इन दवाइयों के ‘कलमची’ तब गुलाम ना थे ।

कच्ची कैरी का स्वाद आज भी हमे याद है ,
घर पे तब इतने मीठे आम ना थे ।

पडोस की छॅब्बो से आँखों में ही इश्क हुआ करता था ,
फेसबुक पे इश्क के ये किस्से तमाम न थे ।

जमीन और आसमान पर शरेआम हक जताया करते थे,
सर पर इतने किसी के ऐहसान ना थे ।

कच्ची दीवारें खुला आँगन सरकण्डे की छॅत्ते,
इतने पक्के और छोटे तब मकान ना थे ।

हाथ में गुलेल, जेब में कंच्चों की खनक की आवाज़,
इतने शोरगुल को सुनने के आदी यह कान न थे ।।

महीनो रहते थे नानी के घर जाकर,
यूं पल दो पल के तब हम महमान न थे।।
(मान कलमची)

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