मैं क्या करूँ उसकी-तारीफ़”””””””””

मैं क्या करूँ उसकी-तारीफ़”””””””””

पूछो ना मूझसे तुम यारों, की वो कितनी सुंदर है
अदब, सादगी और अदा की, चंचल परिपूर्ण सरोवर है |
उलफत है ये बतला पाना, तुम पूछते हो, तो मैं कहूँ
शब्द सुंदर का पर्याय हो केहना, बोधित ले उसका नाम करूँ |
उसके बालों का क्या केहना, स्याह रात लेती है पनाह ।
अँखियों का तुम ना पूछो यारों, सरेआम कत्ल का करे गुनाह |
गुल गुलाब की पंखुङियों से, लबों का उसके क्या केहना
थाम लो दिल को कितना भी, देख उसे निश्चित है ढेहना |
अश्व बन रक्त दौड़ लगाए, वो कंठ स्वर से बोल जो बोले
कानों के पट करते हैं गुलामी, दिल की नईया खाए हिचकोले |
संगेमरमर केहना उसको, मुझको गद्दारी लगता है
चाँद की उपमा उसको देना, बिलकुल आवारी लगता है |
केहने को शब्द ना-काफी है, उसकी मैं छवि कैसे दरशाऊँ
जो समझ सको तुम मेरा इशारा, इंगित कर अपसरा भी, कमीं पाऊँ |
शायद वो साँचा टूट गया, जिसमें था उसको गया ढाला
नीचे आ के तू देख खुदा, भूलेगा देना जन्नत का हवाला…..।।

मैं कर ना सका, ना कर मैं सकूँगा, इन शब्दों से और तारीफ़…………..
मैं क्या करूँ उसकी-तारीफ़,, मैं क्या करूँ उसकी-तारीफ़
By Roshan Soni

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