तुम और मैं

    तुम सुन्दर रूप धरा का
    मै उस पर कही दूर गगन !
    ये दुनिया तब तक अधूरी
    जब तक न हो दोनों का मिलन !!

    तुम ठहरी शांत झील सी !
    मै उस कीचड़ का खिलता कमल
    शोभा होती कमल से झील की
    बिना झील नहीं खिलता कमल !!

    तुम ओस की गिरती बून्द
    मै बंजर भूमि की सुखी घास !
    टपक गिरे तो मोती सी चमके
    तिनके को मिलती जीने की आस !!

    मै बहती पवन का वेग
    तुम पुष्प-लता सुगन्धित !
    दोनों जब मिल जाए संग
    जग में जीवन हो जाए आनंदित !!

    तुम अथाह प्रेम का सागर
    मै बहता उसका मीठा नीर !
    हम जीवन का बने पर्याय
    एक आत्मा अपनी, भले दो शरीर !!

    !
    !
    !

    डी. के निवातियाँ ___________@@@

2 Comments

  1. Bhawana Kumari Bhawana Kumari 19/07/2017
  2. डी. के. निवातिया डी. के. निवातिया 19/07/2017

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