“”””दर-दिलबर””””

आज जो दिलबर, आज जो हमदम, मैं ज्यों गुज़रा तेरी दर
कदम ताल बस थम से गए, ख़ुशी जो छलकी कुछ इस कदर
पाया जीवन हर लम्हों ने, तड़प उठे हर दफ़्न किस्से,
रूप मिला वक्र स्वपन को, दरश-नैन से रूठे हर हिस्से
मिले कोई तो कह मैं सकुँ, क्या लेना-देना है तुझसे
पर घूमूँ, कमबख्त आईनों की बस्ती, भला हाल कहूँ मैं जा के किससे
कुछ तो तक़दीर के मारे थे, कुछ के कातिल थे तुझ जैसे |

तू ना आई, तू ना आये, तेरा मुझमे आना जाना है
गलती से सही पर देख तो ले, ये मुखड़ा तो ना अंजाना है
ओझल होते ही तेरे जो, वापी अँसुओ की भर जाती
मुझको ना सही, इन याचक से, नैनों को आ के तो हर्षाती
देख तू आ, मैं गाता कैसे ?, अपने दिल का हर नगमा
तू चाँद -तारों की बात है करती, मैं ह्रदय का लगाओ मज़मा |

माना तुझको मेरी ना सही, पर मुझको तेरी ज़रुरत है
पत्थर के हर दर पर जाकर, क्या मांगना तुझे फज़ीहत है
कहता है खुदा जा भूल उसे, तुझको ये मेरी नसीहत है
तू भी सुन ले ऐ नूर-ए-खुदा, इश्क़ इबादत समझने को, तेरी ना-काफी सख्शियत है
बैर लिया जो उस रब से, उसने मरना मुश्किल यूँ किया
जीने को दे दी सारी उमर, मरने का पता, मुझको ना दिया |

आज जो दिलबर,आज जो हमदम, मैं ज्यों गुज़रा तेरी दर
कदम ताल बस थम से गए, ख़ुशी जो छलकी कुछ इस कदर ||

By Roshan Soni

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