तुम्हारे पत्र

आज कई दिनों बाद
फिर पढ़े हमने तुम्हारे पत्र

सागर से गहरे भाव में कैसे नही डूबे कोई
पीपल सी घनी छाव में कैसे नही बैठे कोई

सोचा था हमने कि
प्रेम न कभी होगा हमे
पढ़ कर लगा फिर आज
ये था असंभव तुम्हारे पत्र

प्रेम भरे नयनो से कैसे नयन चुराए कोई
कैसे किसी का हृदय तोड़ कर मुस्कुराये कोई

सोचा था हमने कि
देखेंगे न कभी किसी को प्रेम से
पढ़ कर लगा फिर आज
ये था असंभव तुम्हारे पत्र

शहद सी मीठी बातो का कैसे न हो आदि कोई
हाथ तुम्हारा थामने को कैसे न हो राज़ी कोई

सोचा था हमने कि
न थामेंगे हाथ किसी का
पढ़ कर लगा फिर आज
ये था असंभव तुम्हारे पत्र

आज कई दिनों बाद
फिर पढ़े हमने तुम्हारे पत्र

5 Comments

  1. vaibhavk dubey वैभव दुबे 19/03/2015
  2. Archana Archana 19/03/2015
  3. CHIRAG RAJA 21/03/2015
    • Archana Archana 12/04/2015
  4. roshan soni roshan soni 24/03/2015

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