“””””””दिल-ए-नादान””””””

“””””””दिल-ए-नादान””””””

ऐ दिल-ए-नादान, बन ना इतना अनजान
कहने को है, तू मुझमे, धड़के तू उसके नाम |
क्यों अपने आप की करता है ? क्यों ना सुनता है तू मेरी ?
जिसकी खातिर इतना तड़पे, उसको तो “सिफर”, ख़बर तेरी |

अब सेह ना सकूंगा मैं ज़ालिम के, धोखे के घातक तीर
सब कुछ हारा, दुनिया खो दी, अबतक बस तेरी ही खातिर |
क्यों उसके नैनों के खंज़र, मयान-ए-दिल, ले के घूमूं ?
तनहा हो यादों में क्यों उसकी ?, दर -दर बंजारा बन झूमूँ |

खोना जिसकी बाहों में था, यादों को उसकी, कहाँ खो आऊं?
तकलीफ मोहब्बत का ऐ दिल, दो लफ़्ज़ों में कैसे बतलाऊ |
चलता ना तेरी मैं राह जो अगर, होता तड़पा बस पल दो पल
मान तेरी जो रोता हूँ, कल भी रोया, रोऊंगा भी कल |

उसको अपनाने की चाह जो थी, तुझको खोकर ना की थी कभी
होता जो इल्म, तू होगा ना -संग, रोकता तेरा मैं कारवां तभी |
मुझको ठुकरा के तू कैसे, जीता है मोहब्बत का आलम
है तू नादान, जो हंसी को उसकी, समझा है दर्द-ए-मरहम |

राख़ बनु मैं तुझ बिन, दर्द-ए-कैदी की यही ज़मानत है
तेरा मुझसे है वास्ता कैसा ? तू तो उसकी ही अमानत है |
ऐ दिल-ए-नादान, बन ना इतना अनजान
कहने को है तू मुझमे, धड़के तू उसके नाम |
By Roshan Soni

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