“”””” मन के हारे “”””

“”””” मन के हारे “”””””

कहे फ़क़ीर , सुन मन के हारे, तू क्यों इतना घबराता है
हारा तो है तू अंतर्मन का , फिर क्यों दिल को समझाता है |
जो तू चाहे तू जग जीते, तो कर न किसी का मान हनन
दूजे की कमी का ढोल ना पीट , ना हराने की कर कोई जतन |
अपने कौशल का दुर्ग बना , जिसको ना कोई भेद सके
कद -काठी का ना कोई काम, जब मन ही होंगे थके -थके |
देखे मैंने हैं ऐसे वीर, वीरों की गाथा गढ़ते थे
झेल सके ना मन की पीड़ा , स्व-प्रतिबिम्ब से डरते थे |
देखे कुछ ऐसे धीर-धनि, जो लगते थे हारे -हारे
संकट की अमावश स्याह समय , चमके वो बन कर ध्रुव तारे |
क्यों खोने से तू डरता है, यहाँ कुछ भी नही है तेरा
जिसका है दिया क्यों भूल उसे, रटता है मेरा -मेरा |
फेर ना मनका , कर बस मन-का, सब उसकी ही माया है
दौलत -शोहरत को छोड़ तू पगले, तेरी तो ना ये काया है |
झुठे जीवन की करे कामना, मृत्यु तो सच का घेरा है
पार करन को सागर-जीवन, “आत्म” इकलौता बेड़ा है |
कहे फ़क़ीर , सुन मन के हारे, तू क्यों इतना घबराता है
हारा तो है तू अंतर्मन का, फिर क्यों दिल को समझाता है ||
By Roshan Soni

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