माँ ,मम्मी, अम्मी या आई

“””””””””माँ,मम्मी,अम्मी या आई””””””””””

कैसे समझाऊँ?, कैसे बतलाऊं?, वो नारी मेरा मान है
सबसे है अलग, सबसे है जुदा, वो मेरा अभिमान है |
सिर्फ दर्द नही, हर ख़ुशी में भी, याद तुझे मैं करता हूँ
इक जनम था तब, अब मरते दम तक, हर लफ्ज़ में तुझको रखता हूँ |
इस कुदरत की खूबसूरती सारी, तेरी सादगी में है समाई
ममता है वही, बस नाम अलग,, माँ, अम्मी, मम्मी या आई |
बस कहने को मैं बड़ा हुआ, गोदी तेरी को तरसता हूँ
देदे जो खुदा वापिस वो बचपन, बदले, ता-उमर अरजता हूँ |
पलती जन्नत भी गोद तेरी, इसलिए खुदा भी जलता है
कभी आता है आदम बन के, कभी राम -कृष्ण बन पलता है |
जब रूठे तू , कुछ न बोले, उजड़ी ये दुनिया लगती है
मुस्काती है जब बच्चों सी, क्यों? दुनिया वहीं ना थमती है |
आँखों आंसू जो आये तेरे, गिरता हर बूँद कुरेदे है
दर्द भरे वो शूल बनकर, ह्रदय को मेरे भेदे है |
लौटाने को मुस्कान मैं मुख पर, ये जीवन भी अर्पण कर दूँ
होता है अगर अगला जो जनम, उसमे भी तेरी कोख लौटूँ |
मूरख हैं वो जो छोड़ तुझे, काटे काशी-तीरथ के चक्कर
मुझको तो जन्नत भी लगती छोटी, लेटूं जब गोद में तेरी थककर |
पूजे मूरत जो पत्थर की, जीती सूरत को भूल सभी
धोये पापन, बाटें लंगर, एक कोर ना पूछे माँ से कभी |
मेरा तो गवाह, बैठा वो खुदा, सांस मैं लूँ या भरुं जो आह
गर लिखता है हर सांस को यम, तो भर दे पन्ने लिख-लिखकर “माँ ” |
सेह सकता हूँ धड़कन की दुरी, सेह ना सकु मैं माँ से जुदाई
मूरत है वही, सूरत है अलग,, माँ, मम्मी, अम्मी या आई ||
By Roshan Soni

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