“”””कवि ना बन जाऊँ- ऐ निकिता”””

“”””कवि ना बन जाऊँ- ऐ निकिता”””

मैं चाहूँ तुझको इतना, कैसे बतलाऊ कितना
जो कहे मुझे बतलाने को , देखूं सागर में पानी जितना |
बाँटें जो संग में , पल सुख -दुःख के
क्या तनिक भी तुझको , याद नही वे |
तुझ संग मरना जो सीख गया , फिर तुझ बिन कैसे अब मैं जीता
डरता हूँ कहीं मैं इश्क़ तेरे में , कवि ना बन जाऊँ निकिता |

पल पल तुझ संग हँसने वाले , इस मुखड़े का वो पल ना रहा
तुझ संग छुपके रोने वाले , तुझ बिन -आँखन ना नीर बहा |
बंज़र तपते इन नैनों को , तुझ बारिश का है आस बड़ा
अब तो मरना भी भारी है , दो गज़ को भी मना करे धरा ।
तू थी तो प्याला भुला था , अब संग मयखाने हूँ पीता
डरता हूँ कहीं मैं इश्क़ तेरे में , कवि ना बन जाऊँ निकिता |

चाहत का नशा इतना था मुझे , पागल दीवानों पर हस्ता था
टुटा जो नशा तब मैंने पाया, वो मेरा भी रस्ता था |
बिखर गया मैं टूट गया , जब देखा दीवानो का टोला
टूटे टुकड़ो को लिए समेटे , लिखने को कागज़ -कलम टटोला |
लिखने को दिल के अरमान थे सारे , मोहब्बत के सारे एहसास मैं लिखता
थमी सांस , रुक गया कलम , बस लिखते ही “ऐ निकिता , ऐ निकिता ।
डरता हूँ कहीं मैं इश्क़ तेरे में , कवि ना बन जाऊँ निकिता ।।
By Roshan Soni

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    • roshan soni roshan soni 14/03/2015

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