बुढ़ापा मेरा साथी

रोज मुझे तंग करता है,
रोज मुझसे जंग करता है,
ललकार रहा है वो मुझे,
जबसे पैदा हुआ हूँ,
नित नए रंग करता है।
कतरा-कतरा जर्रा-जर्रा,
इंच दर इंच ठहरा-ठहरा
कदमों की पदचाप बिना ही,
घूमता है वो शहरा-शहरा,
चुप-चाप चलता साथ मेरे,
ना जाने उसके कितने चेहरे,
छोड़ रहा निसान निसदिन,
लगा देता कितने पहरे,
पैदा हुआ था साथ मेरे,
नहीं दिखाता अपने चेहरे,
जब-तब मौका पा जाता है,
निसान अपने दे जाता है।
कभी सफ़ेद बाल,
कभी बुढ़ाती खाल,
कभी नहीं दिखता दूर का मंजर,
कभी खांसी से बुरा हाल।
धीरे-धीरे होता है हावी
तन पर करता रहता हमले
थकाता रहता मन को भी,
चलता रहता नहले-दहले,
धीरे-धीरे खा जाता है,
जीवन के सतरंगी सपने
ज्यों-ज्यों इसका असर फैलता
दूरी बना लेते है अपने।।
समझ अभी तक नहीं पाया हूँ
क्यों हुआ है जन्म मेरा
और क्यों पाया है
इस तन को
फिर जाने कब तक भोगेंगे
अनन्त यात्रा कब होगी
पर जब भी होगी मेरी
छुट जाएगा पीछा इससे
साया जो जन्मा साथ मेरे
छा रहा जो बन के बुढ़ापा
आखिर तो पीछा छूटेगा ही
पर इसके साथ जीना भी मजबूरी है,
जीना जरूरी भी है,
तो जीते जाओ
बुढ़ापे को साथ मे पीते जाओ।
जीते जाओ॥

Manoj Charan “kumar”
mob. 9414582964

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