।।ग़ज़ल।।खुद को गवां बैठा हूँ।।

।।गजल।।खुद को गवां बैठा हूँ ।।

मैं कब से उनके चेहरे पर नजरें गड़ा बैठा हूँ ।।
वे तो खामोश है मैं खुद को भुला बैठा हूँ ।। 11।।

यकीन उनको भी है उनकी रहनुमाई का ।।
और मैं भी उनकी याद में पलके झुका बैठा हूँ।।2।।

शुक्रिया अदा करता हूँ उनकी हर मुस्कराहट का।।
उनके रुख्शत पर हर एक शै लुटा बैठा हूँ ।।3।।

शहम जाता हूँ उनके करीब से गुजरने पर ।।
मग़र दूरियों में उनकी ही तस्वीर छिपा बैठा हूँ ।।

कल ही उसने पूंछा कितनी मुहब्बत है तुमको ।।
कैसे कह दू उनकी अदाओ में खुद को गवां बैठा हूँ ।5।।

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