तस्सवुर में

ये ग़ज़ल मैंने लिखी है
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर
जी रहा हूँ इसलिए कि
कभी देखूंगा जी भर-भर कर
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर
क्या जुनून है तुम्हें पाने की
न थका हूँ चल-चल कर
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर
मैं डूबा हूँ तेरी यादों में
कभी न सोचा रूक-रूक कर
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर
भूल गई क्या वो लम्हा
कभी कही थी मुझे अपना रो-रो कर
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर
लिख रह हूँ ये ग़ज़ल कि
सुनोगी तो आँशु गिरेंगे बह-बह कर
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर
जी रहा है संजीव अब तक
ज़माने की ज़ालिमि सह-सह कर
तुम्हें तस्सवुर में रख-रख कर

One Response

  1. sanjeevssj sanjeevssj 12/03/2015

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