इश्क़ तेरे में–

इश्क़ तेरे में ऐ नाज़नीं, बन बैठा आवारा मंज़र
धरती जैसे हो जाती है, बारिश के तड़पन में बंज़र |
सड़को पर बिखरा मैं गुलाल, थी चाहत गलों पर लगने की
पलकें बन आ, हम मिल जाए, इच्छा न मेरी कभी जगने की |
बन बैठा मैं वो मेहताब, अपनी तक़दीर पर हर्षे है
करके उजरी सारी दुनिया , खुद की चांदन को तरसे है |
कुछ यूँ था मेरा, जीना -मारना , जैसे नदियां -सागर संगम
खुद को खोकर तुझसे मिलना, चाहत ये मेरी , रहे जनम -जनम |
कंठ बना मैं दर्द भरा, स्वर जिसका तुझे देख निकले
कुछ और ये आँखे देखें कैसे ,उनपर सपने तेरे चमकीले |
संग जो थी जब तू मेरे , ये जग सारा तब रूठा था
गाता है अब सुर -संग मेरे , संग तेरा जो छूटा था |

इश्क़ तेरे में ऐ नाज़नीं , बन बैठा आवारा मंज़र
धरती जैसे हो जाती है , बारिश के तड़पन में बंज़र |
बिछड़ी जब तू ये दिल टूटा , जीत गया ये जग कायर
टूटे दिल का कोई मोल न था , सोचा फिर मैं भी बन लू शायर |
होते है अच्छे वो शायर, जिनके हो कभी ये दिल टूटे
मैं सोच यही महफ़िल में गया , पर , तुझ स्वर बिन ये कंठ कैसे फूटे ?
फिर सोचा नग्में लिखकर, तुझको बदनाम कर जाते हैं
लिखते ना कलम हैं वो अक्षर, जो नाम तेरे ना आते हैं |
कैसे देखू अब और मैं कुछ , आँखों में तेरा जो साया है
खुलते ही नही कुछ देखन को , इनको बस तू ही भाया है |
मिले खुदा तो पूछूंगा, क्यों ? मुझको दिल तूने है दिया
देता मुझको भी वो ही पत्थर, जो उसके सीने में है दिया |
माना उनपर कल मरते थे , पर आज उस बिन हम जीते हैं
सब खोकर भी हम रंक ना हैं , सब पाकर भी वो रीते हैं ||

इश्क़ तेरे में ऐ नाज़नीं , बन बैठा आवारा मंज़र
धरती जैसे हो जाती है , बारिश के तड़पन में बंज़र |
By Roshan Soni

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