कर्ज

कुछ बिना भुनी सांसें संभल रखी हैं ,
चुकाने को जो ले रखी थीं उधर किसी बनिया से
जो एक साथ खर्च हो गयी मुझसे
कुछ बेटे के होने पर और कुछ बेटी की शादी पर
थोड़ी थोड़ी कर के चूका रहा हूँ अब तो हर हफ्ते , हर महीने , हर साल
रोज़ रोक लेता हूँ कुछ पल अपनी जिंदगी उस उधार को टर्न में
लेकिन जरूरतें इन किराये की खुशियों की काम नहीं होती दिखती
बस बढ़ती ही जाती हैं दिन पर दिन , हफ्ते दर हफ्ते और साल दर साल
कभी कभी तो डर भी जाता हूँ की बीता हुआ कल हावी न हो जाये आज पर
आज की जिंदगी कल के उधार में खर्च न हो जाये
लेकिन फिर भी बस थोड़ा थोड़ा करके ये बढ़ता ही जाता है
अब शायद इंतज़ार है उस दिन का , जब आज कल को चुकाने में पूरा खर्च हो जायेगा
और अगर किसी रोज़ कल आज से भी बड़ा हो गया तो चला जाऊंगा लेकर सीने पर रखा हुआ इसे .

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