प्रेरणा

क्षितिज कहां है ?
मेरा क्षितिज कहां है ?

वह देखो जहां गगन झुका है,
जहां धरा के छोर उठे हैं ,
दोनो मिल कर एक हुए हैं ,
क्षितिज वहां है –
वही क्षितिज है !

चलते चलते बरसों बीते,
आशा के कई पतझड़ बीते,
क्षितिज वहीं का वहीं खडा़ है,
क्षितिज कहां है ?
मेरा क्षितिज कहां है?

भ्रम में डूबे हो तुम -राही
ना तो कहीं गगन झुका है,
ना ही धरा के छोर उठे हैं,
यह तो केवल मृगतृष्णा है –
क्षितिज नहीं है !

गगन -धरा कभी एक हुए हैं ?
प्रेम -सुधा उपलब्ध हुए हैं ?
यह तो केवल विमल प्रेरणा –
नहीं क्षितिज है –
क्षितिज नहीं है !

—–बिमल
(बिमला ढिल्लन)

One Response

  1. anita kakkar 23/03/2015

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