गज़ल

न ख्वाब में न चांद में न कलियों में तुम्हे देखा है
जब भी सोचा है तेरे बारे में तुम्हे अप ने ही दिल में देखा है
और ये कैसी तासीर है इस मुआ मोहब्बत की
जितना दूर होना चाहा तुम्हे उतना ही करीब देखा है
मैं भूला ही देता तुम्हे जो तू याद में होती
कैसे होउं जुदा तुम्हे जो अपने नसीब म्ं देखा है
कभी इजहार न किया तो ये न समझना कि मोहब्बत नहीं
हमने अल्फाज में नहीं तुम्हारी नजरो में प्यार देखा है
मैं कर दूं ये जिदंगी तेरे नाम जिदंगी जो मेरी होती
मैने तो अपनी हर सांस में तुझे यार देखा है

अजीत चारण रतनगढ चूरू ९४६२६८२९१५