ज़िंदगी तुझसे ख़फा मै तो नहीं था

ज़िंदगी तुझसे ख़फा मै तो नहीं था,
फिर तुम क्यूँ मुझसे ही रूठे जा रही हो .
तुम ही इक जीने का मेरे थीं सहारा,
तुम ही अब दामन छुड़ाए जा रही हो.

इस जहाँ मै हर तरफ तूफान हैं
न किसी के रूप की पहचान हैं
हैं नहीं कीमत यहाँ रिश्तों की कोई
हर कोई खुद ही बना भगवान हैं .
ऐसे आलम मेँ हर दोष तो अपना नहीं था,
रात दिन फिर क्यूँ रुलाये जा रही हो .
ज़िन्दगी तुझसे ख़फा मैं तो नहीं था ……..

दर्द के साये मेँ जीना चाहता था
गम के आंसू मैं सभी से मांगता था
पर ख़ुशी की रौशनी तुमने दिखाई,
मैं हकीकत को भला क्या जनता था .
मंज़िले आगाज़ करके अब खुद ही ज़ालिम
रौशनी खुद ही बुझाए जा रही हो .

ज़िंदगी तुझसे ख़फा मै तो नहीं था,
फिर तुम क्यूँ मुझसे ही रूठे जा रही हो .
तुम ही इक जीने का मेरे थीं सहारा,
तुम ही अब दामन छुड़ाए जा रही हो.

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