बसंत पर कविता

प्रकृति ने धरती का सृंगार किया
बहुरंगे फूलों के संग
शोभित करके अनुपम छबि से
भर कर हर तरु मैं नव जीवन रंग
सुरभित पुष्पित हुई द्रुमदिक लता |

गूंज उठा संगीत भ्रमर
वन उपवन मैं मन हर लेता
खग वृन्दों का मृदु नव स्वर |

गूंज उठी शहनाई सी
मृदु तान हिलांश अब वनप्रिय की
पीत वसन से लिपटी दुल्हन धरती
सिमट गई बाँहों में अपने प्रियतम की |

स्वर्ग की स्वप्निल कल्पना
साकार सी लगने लगी
वसंत आने की ख़ुशी में
हर कलि खिलने लगी |

प्रियतमा से मिलने अपने
आज यहाँ ऋतुराज आया
मिलन का संगीत देकर
प्रकृति ने यह गीत गाया |

सुख चैन की कल्पना
है अधूरी दुःख के बिना
मिलन का भी सुख अधूरा
विरह के दुःख के बिना |

है यही अनुभूति जिससे
सुख की सच्ची पहचान होती
दृगों में हों अश्रु जिसके
ओठों में उसकी नहीं झूठी
मुस्कान होती ||