प्रेम, आज-कल

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प्रेम जो जाऊं जग में ढूंढन, पाऊं केवल जिस्मों का खेल
ढूंढ ना पाया कृष्ण प्रेम जो, बिना मिलन बस मन का मेल ||
तब पाया की क्यों जग में, प्रेम हुआ हैं इतना मैला
मन मिलाप की बात हैं करते, तन-मोह का व्यापार हैं फैला ||
नाड़ी काटे, फंदा फसाएं, मोहब्बत का देते कुछ यूँ संकेत
जो सोचो गर राँझा भी करता, क्या खुल पाते प्रेमों के भेद ||
आज प्रेम का मतलब ना पूछो,बस चाहे एक-दूजे को पाना
इतने प्रसांगिक किस्से सुनकर भी, अर्थ प्रेम ना कोई जाना ||
काश! सावरिया आकर के, प्रेम रसमयी बतलाते
इस जग को होता फिर ज़ाहिर, हम क्यों हैं दीवाने कहे जाते ||
ये क्या समझेंगे प्रेम दीवाना, जो कुछ भी खोने से डरतें हैं
पूछो इस धरती-औ-अंबर से, जो क्षितिज मिलान को तरसते हैं ||
युग चाहे हो हीर-राँझा, या फिर हो सोनी-महिवाल
हर युग के प्रेमों के बीच, सर्वदा ये जग बना हैं ढाल ||
यह ढाल बने मर्यादा की, प्रेम लज्जित ना हो पाए
जग ना बने इतना क्रूर भी, “मान-हत्या” ही करता जाए ||
कृष्ण भाव का प्रेम जो गूंजे,जग भी शामिल तब हो जाए
तन का मेला कबहु ना लगे, मन का विनिमय सबको भाये ||
by Roshan Soni