—–विरह की होली —-

    1. —–विरह की होली —-

      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे
      रुक्मणी से राधा बोली,हम बनावे अपनी टोली
      संग-संग मिल हम तुम खेले, देख मुरारी तरसे
      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे …!!

      अबकी होली नहीं अरमान जले है
      रंग नही पिचकारी से बाण चले है
      ब्रज में गोपियों संग ग्वाल खेले है
      फिर काहे कृष्णा राधे मिलन को तरसे
      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे….!!

      अबकी होली ये कैसे गजब ढहाये
      सीमा पे बैठा जवान घर को तरसे
      परदेश रहते जो मेरे देश के लाल
      वो गाँव वतन की होली को तरसे
      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे….!!

      बिन बालम, घर नही कारागार लगे
      होली संग अब गौरी का जिया जले
      विरह घडी कैसी विकट, जिसमे जीना दुश्वार लगे
      मै बनी कैसी अभागन, होली खेलन को मन तरसे
      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे….!!

      हर घर में धूम मची,रंग गुलाल अबीर उड़ाए
      घर में बैठे मैया बाबुल, बेटी की याद सताए
      द्वार लगे नैना ऐसे, जैसे गुड़िया दौड़ी आये
      मिलन की आशा में दोनों रोते, दरस को नैना तरसे
      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे….!!

      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे
      रुक्मणी से राधा बोली,हम बनाये अपनी टोली
      संग-संग मिल हम तुम खेले, देख मुरारी तरसे
      रंग बरसे, रंग बरसे, रंग बरसे भई रंग बरसे …!!

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      डी. के. निवातियाँ ___________!!!