वस्ल-ए-तन्हाई

Daily_1

आज ही देखा हमने…..

चाँद रोशन था फ़लक पे हमारी,
रात सोई थी सितारों की आग़ोश में,
सिसकियाँ यूँ हवाओ की गुंज रही थी मेरे गोश में…

ये अहल-ए-दिल मायूस था किसी अपने की याद में,
जिंदगी रूबरू करवाती है क्यूँ गम वक़्त-ए-जमाल में,

क्यूँ देती है महोब्बत तन्हाई ऐसे उल्फ़त के लम्हों में,
खुदगर्ज़ भरे है दुनिया में, इल्म-ए-इश्क़ नहीं समज में,

मिल जाते अगर हीर-ओ-रांजा,
क़ुबूल होती सोनी-महिवाल की यारी,
उठते न यूँ जनाज़े लैला-मजनू के सर-ए-बाज़ार में…

नहीं होता कोई शौक़ से ‘ग़ालिब’,
ना होते पैदा ‘आशिक़’ ज़माने में,
ज़रोखे में खड़ा मैं ढूंढू सवाल-ओ-जवाब अपने आप में…

के, आज फ़लक पे देखा रहा मैं,
चाँद खूब रोशन है मेरी वस्ल-ए-तन्हाई में…

आशिक़ ❧

Meaning

  • वस्ल – meeting
  • गोश – the ear
  • अहल-ए-दिल – loving heart
  • जमाल – beauty
  • उल्फ़त – love, friendship, affection
  • फ़लक – sky,heaven,firmament

Leave a Reply