”टूटी हुई तस्वीर पे हार चढ़ा जाता है कोई,

”टूटी हुई तस्वीर पे
हार चढ़ा जाता है कोई,
चारदीवारी में पड़े पत्थरो पे
दूध बहा जाता है कोई,
सजा लेता है उम्मीदों का दर्पण
पर मिलती नहीं है
संतुष्टि कोई,
टूटता इस देश का यौवन
बूढ़े होते उस बचपन को
देख जाता है हर कोई,
एक निवाले की खोज में
डूब जाता इस देश का यौवन
और बूढ़ा हो जाता है बचपन
उम्मीदों की दामन में,
और कही दो बून्द आंसुओ की गिरता है कोई
टूटी हुई तस्वीर पे हार चढ़ा जाता है कोई…..
फकीरी दब के रह जाती है
दिल के किसी कोने में,
औ ढाढस दे जाता है
गरीबी मिटाने का कोई,
गरीबी मिटती नहीं इस देश से
बेशक गरीब मिट जाता है इस भूगोल से
वादे रह जाते है भाषणो तक
दीखते नहीं वास्तविकता के धरातल पे
उदहारण रामराज्य का दे जाता है हर कोई
टूटी हुई तस्वीर पे हार चढ़ा जाता है कोई….”

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