कान्हा तुम न आये

मीरा बन कर पूजा तुमको
राधा बन कर प्रेम किया
ज़हर का प्याला भी पी कर प्रियतम
कहाँ हमको अपनी शरण लिया

सीता बन कर वनवास भी काटा
सती बन कर खुद का बलिदान दिया
अग्नि परीक्षा ले कर भी परखा
फिर भी क्यों हमको त्याग दिया

रुक्मिणी बन कर संग जो बैठी
लोगो ने राधे कृष्णा कहा
उर्मिला बानी तो छोड़ गए वन
भात्र धर्म का नाम किया

दीपक बन कर सदा तुम चमके
हमेशा मेरा बलिदान किया
बाती बन कर सदा जली मै
पर कभी न मुख से आह किया

सदियों से मेरी भावनाओ को
क्यों सदा तुमने नज़रअंदाज़ किया
नाम कमाया राज चलाया
मेरा मन अंधेर किया

कितने हमने जतन किये है
हर पल तुम्हारा नाम लिया
फिर भी जब ये मन रोया
अश्रु की धार बहाये
हम तो ये कठोर मन तुम्हारा
पिघला नहीं पाये

लाख बुलाने पर भी बोलो क्यों
ये कान्हा तुम न आये

लाख बुलाने पर भी बोलो क्यों
ये कान्हा तुम न आये I

6 Comments

  1. Dnyanesh 13/03/2015
  2. vaibhavk dubey वैभव दुबे 19/03/2015
  3. vaibhavk dubey वैभव दुबे 19/03/2015
  4. Archana Archana 20/03/2015
  5. Archana Archana 20/03/2015

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