“”ऐ निशा धुंध – ऐ स्याह रात “”

“” “ऐ निशा धुंध – ऐ स्याह रात “””

ऐ निशा धुंध, ऐ स्याह रात, तू है क्यों इतनी खफा ,
महताब को एक मौका तो दे, दिखलाये वो भी अपनी वफ़ा |
तू क्यों इतनी अलबेली सी, अनकही पहेली से है बंधी ,
नैनों के इन बिम्बों को भी, वें खुद ही लगती हैं अंधी |
दिन की सारी भागा -दौड़ी, में थक कर जितना चूर हुए ,
जी करता कभी अब दूर न हो , एक बार जो तुझे छुए |

उस भोर प्रकाश का भी तुझसे, लगता है कोई गहरा नाता ,
मिलन को तुझसे तरसे कितना, नज़र चुराए तेरे बाद है आता |
उसको भी आता होगा गुस्सा, जब सूर्य स्याह को दूर भगाता ,
दुरी तुझसे उसे न भाये , पर , तेरा वापिस आना उसे सुहाता |
तेरी तड़पन को वो क्या समझे , जो जीने को सिर्फ लेते हैं सांस
तड़पन को समझे वो भंवरा, कुमुद मुरझाये-जिसका जीवन बना उपहास |
मैं भी चाहूँ,, मैं भी चाहू एक ऐसा दिलबर , भले एक न हो पाएं ,
इतिहास गवाह उन नामों का, जो साथ नही -दूजे के लिए जीवन ठुकराये |

जब-जब आँखों को ना भय , इस तपते दिन का उजियारा ,
आहात सी निकली पलकों के मुख से , तेरा ही नाम पुकारा |.
थोड़ी तू सुन , थोड़ी तू सुना , कर ले निँदो से तू बातें ,
ऐ निशा धुंध ऐ स्याह रात, सपनो में हैं तू आते जाते ||
by roshan soni