अपनों का लिबाज

वक़्त की डोर क्यों टूट चली ढलान की ओर,
जब होते हुए अपनों के हाथों में बागडोर,
अब लगता नही मानव अपनत्व की ओर ढहना है,
चल छोड़ दे ऐ बंधू,
फिर क्यों तूने ये ‘अपनों का लिबाज’पहना है!

क्या फर्क है आज ओर आने वाले कल में,
आज है,चले जाने पर कल में बीत जाना है,
आज आया है,कल आना है,
बस यही एक अपसाना है,
फिर क्यों तूने ये ‘अपनों का लिबाज’थामा है!

बीत गई सदिया,न जाने किस वक़्त ने आना है,
यह कौन है अपना,
जिसने हमदर्द बनकर हाथ थामा है,
चल छोड़ दे ऐ बंधू,
इस युग में भी ‘अपनों का लिबाज’मामा है !

कब तक जियेगा इस विष के साथ,
क्यों तूने अपनेपन को अमरत्व का वरदान माना है,
यह कौन है किसी के लिए,
बस वही राग वही गाना है
फिर क्यों ये ‘अपनों का लिबाज’ ड्रामा है !

माना कुछ पल के साथ का अहसास,
जिन्दा कर देगा सूखे अपनत्व की आस,
दुनिया है,यहा जख्म है,
हर मोड़ पर शैतानो का मेला आना है,
कब तक रोक लेगा तू,
यहा फिर आगे वो ही सुर का ताना है,
चल छोड़ दे ऐ बंधू,
यहा किसी ने भी नही सच्चा ‘अपनों का लिबाज’ पहनाना है !

दौड़ चली उमंग कुछ पल की खुशियो के संग,
करके जिंदगी बेरंग,
बस एक कुछ ‘अपना’ कहके संग,
जैसे उड़ गई तितली के तरह नए फूल के संग,
छेड़ गई भोरो में जंग,
फूलो का मजहब किये तंग,
यहा मौत है क्षितिज है सबका,
बस ‘सवना’ का यही कहना है
ऐे साथी छोड़ दे ये फिर जो गहना है
यहा कौन है जो अपना कहके हक़ में है,
फिर क्यों तूने ये ‘अपनों का लिबाज’ पहना है !

माना की है तू कुछ पल के अहसास के लिए,
पर उस पल में भी तेरा खुद का स्वार्थ है,
कब तूने ये वादा दावा कहके सहना है,
फिर क्यों तूने ये ‘अपनों का लिबाज’ पहना है !

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