मैं लिखना चाहूँ एक-‘कविता’

मैं लिखना चाहूँ इक-कविता,
लिखूँ क्या मैं, कोई विषय दो बता ।
भ्रम थी मन में, है बहुत सरल ,
काफी है कागज़-कलम का पटल ।

कस ली कमर, कर ली थी सारी तैयारी ,
हाथ कलम ना काफी था, जब सोच-कलम की गई मत-मारी ।
गहण सोच और ख्वाबों का, मन में था भारी अभाव ,
हो रहे थे, विराने मन के-खाली मतों मे टकराव ।

सोचा कुछ इश्क-कुछ मोहब्बत पर लिखूँ ,
ढूँढने को सुंदरता, दुनिया तो देखूँ ।
तलाश थी दिल को,दिखे कोई बला सी नारी ,
देख ना पाया सुंदरता मन की, तन-सुंदर पर नज़र जो डारी ।

कितने धक्के और थपेङे, खाकर बदली अपनी सोच ,
ढूंढ रहा था सुंदरता उस जग में, जिसकी सोच में थी मोच ।
तब जा कर के मैंने पाया, कविता लिखने की इक आस,
सरल है कठिन, कठिन है लिखना- कठिनाई बनें सरलता की फाँस ।

इक कागज-कलम क्या दर्शाए, क्या होती-कैसी होती है कविता ।
हृदय के कोरे कागज़ पर, मन के कलम में ख्वाब पिरोकर,, लिखना ही तो है “कविता ।।

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