मस्से का मसला

ना जाने क्यों दिल, भरी महफिल
इक मस्से पर है जा अटका ,
ना मैं जानूँ, ना वो जाने
फिर भी क्यों, दिल को लगा झटका ।

क्या सुनाऊँ, क्या बताऊँ,यारों मैं वो किस्सा ।
जाने क्यों भरी महफिल में, मसला बना है इक मस्सा ।।(1)

ना मैं मजनू, ना मैं राँझा
फिर भी वो है, मेरी मँखना ,
उसे निहाँरू और मुस्काऊँ
लागे, उसे ना रीझे मेरा तँकना ।

क्या सुनाऊँ, क्या बताऊँ,यारों मैं वो किस्सा ।
जाने क्यों भरी महफिल में, मसला बना है इक मस्सा ।।(2)

मैं कण बन बैठा बीच भँवर
जीवन का था वह स्वर्ण हिस्सा,
देश ध्वसत करने को काफी, बम-बारूद और असला
मुझ दिवाने को था काफी, उस मुखङे का स्याह मस्सा ।।

क्या सुनाऊँ, क्या बताऊँ,यारों मैं वो किस्सा ।
जाने क्यों भरी महफिल में, मसला बना है इक मस्सा ।।(3)