क्रन्दित कान्ता

रात घनी थी ,अँधेरे में घुली सी थी
कांता बेचारी घर से चली थी
काम जरूरी था टालने में मुस्किल बड़ी थी
जाने कहा से कमबख्त हवस के शिकारी आ गए
कांता को उठाकर जंगल में ले गए
वो चीखती रही चिल्लाती रही
मदद के लिए आवाज लगाती रही
दहल उठा था जंगल सारा
कांता ने मदद के लिए बहुत पुकारा
रस्ते से लोग यूं ही गुजरते रहे
वो वहशी दरिंदे उसके दामन को छलनी करते रहे
कांता इस घटना सहमी सी थी
उन दैत्यों में मानवता की कमी सी थी
कुकर्म का तांडव करके वो , कांता को वही छोड़ गए
कांता का मानवता से भरोसा तोड़ गए
जख्म जिस्म के भर जायेंगे दिल के जख्म भरेगा कौन
तब भी चुप थे ,क्या अब भी लोग रहेंगे मौन
तोड़ चुप्पी को आओ एक प्रण करे
कोई कांता फिर ऐसे न मरे !!!!!!!!!!!!!!!!!!!

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