“एहसास, जो कभी तेरे ना हुए”

“एहसास, जो कभी तेरे ना हुए”

एक एहसास का पुलिंदा था, ना बस तेरा था-ना बस मेरा था ।
पलकों की साज़ो पर भी, इक आस जो थी आने की तेरी l ।
कुछ एहसास जो थे, अनकहे , अनछुए ।
तेरे ही तो थे सभी वो , कभी मेरे ना हुए |

जो यादों की मसरूफियत, तेरे जाने के बाद है
एहसासो का क्या कहना, वो अबतक नासाज़ है |
कहने को तो ज़िंदा थे अभी हम, मृत अभी घोषित ना हुए
मिटटी से मिलन की आस तो थी, चाहत थी तुझे छूने उपरांत छुए |

मैं तुझको देख ना पाऊंगा, इस पिंजरे में घूँटते-मरते ।
हर जन्म में ये एहसास रहे, चाहे यम रहें हमें हरते ।।
मैं तुझ बिन गा ना पाऊंगा, तू मुझ बिन सुन ना पाएगी ।
ना मुझको कोई कहता है दिवाना, ना तू है वो पागल लङकी ।।

बस एहसास ही थे जो थे बाँधे, तेरे-मेरे ख्वाबों की डोर ।
कहने को थे हम इक दुनिया में, बस अलग-अलग थे हमारे छोर ।।
कहूँ आज भी, कल भी कहूँगा, जो कल तक कहता आया था ।
इक एहसास का पुलिन्दा था, ना बस तेरा था ना बस मेरा था ।।
By roshan soni

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