हैं जहाँ रुक जायें

आ लहू के घूँट दो नीचे उतारें हम हलक से।
और फिर कुछ सभ्य होकर भीड़ में खो जायें यारों।

है जमाने की यही अब माँग हँसकर आदमी से।
आदमी बनने से पहले जानवर हो जायें यारों।

आपने माना कि लड़ना नीचता का काम है पर।
जग हँसाई से बचें तो नीच हम हो जायें यारों।

वक्त का हर आईना धुँधला पड़ा है आजकल तो।
टूटना ही है तो क्यों ना आईना हो जायें यारों।

चाल कोई भी न चलती दण्ड का आदेश प्रभु दे।
इसलिये बस सिर झुकाकर हैं जहाँ रुक जायें यारों।

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