“नारी की अंतर-वृथा”

मैं नारी अपनी वृथा, कहती हूँ अपनी कथा |
समाज के झंझालों से, अपमान के उन गलियारों से,
हर पल मुझको आना-जाना है, स्वाभिमान को बचाना है ||
जीवन के दो पाटों में, क्यूँ मुझको पिस जाना है |
नारी होना दोष मेरा, यही पुरुष ने माना है ||

—- कवि कौशिक

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