इंतज़ार

तक-तक करते अंखिया थक गयी
सावन तुझे बुलाते हैं
बचपन के झूले और
अमरयाँ के चंद टिकोरे
कभी गिरते, चढ़ते – चढ़ते
कभी कुदक- फुदक हम जाते
तक-तक करते अंखिया थक गयी …
सावन तुझे बुलाते हैं …
मीठी जलेबी और खट्टी इमली
जी को ललचाते हैं
कभी मेले में जाने को दिल करता
कभी झूले पर चढ़ जाते हैं
चाट – पकोड़ी की बात न पूछो
पानी – पूरी बेबस कर हमें बुलाते हैं
तक-तक करते अंखिया थक गयी
सावन तुझे बुलाते हैं

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