मैं शिला हूं

मेरे अस्तित्व को बालू के ढेर सा मत समझो
कि तुम रौंदते हुए चले जाओ –
हवा के एक झोंके के साथ –
तुम्हारे कदमों के निशान मिट जाएं –
और फिर वही साफ़ समतल तह लिए
मैं मुस्कुराता रहूं –
जैसे कुछ हुआ ही ना हो ?

मैं बालू का ढेर नहीं —
बनना मिटना कोई खेल नहीं –
मैं शिला हूं —
वह शिला जो बरसों से खड़ी है –
सागर के छोर से टकराती हर लहर –
भूतल से उठते हर तुफा़न में
अपने बल को बनाए है !

इस पर अगणित प्रहार हुए –
और -हर प्रहार का निशान बाकी है –
इस का अतीत है -अपना इतिहास है –
क्या इस इतिहास को मिटा सकते हो ?
ये असंख्य दरारें पूछती हैं –
क्या इन को मिटा सकते हो ?

ये दरारें ही तो मेरा इतिहास है –
यही तो मेरे अस्तित्व की पहचान हैं !

मेरे अस्तित्व को तुम
बालू की तह सा मत समझो –
जो सागर की हर लहर के साथ
बदल जाती है !

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