अब डर कैसा ?

शीश झुकाया बलिवेदी पर –
है अब घबराना कैसा ?
जीवन है नाम तपस्या का –
तप से डर जाना कैसा ?

पग उठ ही गए लक्ष्य के लिए –
फिर पथ में थकना कैसा ?
पग आगे धरो, तप पूरा करो –
यह पीछे मुड़ना कैसा ?

बन शान्त और गहरा सागर सा –
नदियां सा छलकना कैसा ?
स्थिर मन की शक्ति जान के भी –
अस्थिर बन जाना कैसा ?

अग्नि है यह -जल जा इस में –
फिर नवतन होगा ऐसा –
रात्रि की स्याही से निकले
सुबह के सूर्य जैसा !

—–बिमल
(बिमला ढिल्लन)

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