प्रभात बेला

उस छोर यह लालिमा कैसी ?
क्या दिनकर तुम आए हो ?
या केवल यह मृगतृष्णा है,
भ्रमर मधु भ्रम भरमाए हैं ?

रुनझुन सी पायल बोली कुछ ,
वीणा से मधु झंकार हुई ,
मन झूम उठा डाली की तरह ,
तन में सरगम साकार हुई !

तृषित नयन हो व्याकुल से ,
लुकछुप आंचल से झांक उठे-
दिनकर तो नहीं ,फिर कौन हो तुम ?
मैं तो प्रभात की बेला हूं !

—————- बिमल
(बिमला ढिल्लन )

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