मेरा घर आँगन था जो

मान जब पर्दों में था, क्यों वो ज़माना खो गया |
आज घर का हर कदम, हम से मैं क्यों हो गया ||
एक बड़ा बादल सरीखा, बूँद बन कर गिर रहा |
मेरा घर आँगन था जो, अब शहर क्यों हो गया ||
डाल बरगद की गिरी तो पेड़ वो छह बन गए |
एक थे जो अब तलक सात अब वह बन गए ||
बढ़ रहे आकाश तक वो, खुद से ही है होड़ यह |
खेल थे पहले कभी ,वो मात और शह बन गए ||
प्यार था पहले कभी जो अब कहर वो हो गया |
शाम का मौसम था जो अब दोपहर वो हो गया ||
हैं नज़ारे अब नदारद, सब खिड़कियाँ दीवार हैं |
घर मेरा कुछ बंटा ऐसे, अब शहर वो हो गया ||

-‪‎विकास भांती‬

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