अधूरी लगती है।गजल

जबसे तुमसे दूर हुए हर बात अधूरी लगती है।
हँसना भी महफ़िल में एक मजबूरी लगती है।

वैसे तो लोगों के करीब अक्सर ही रहता हूँ मैं।
पर सच कहूँ खुद से भी खुद की दूरी लगती है।

बीते लम्हातों में जब ये दिल मेरा खो जाता है।
आँखों के गुलशन में तू लता-कस्तूरी लगती है।

वो बातों में हाथों से हाथों को सहलाती तपिश।
जुल्फों में छुपे चेहरे पर चाँद सी नूरी लगती है।

कभी रूठते कभी मनाते कभी मासूम शरारत से।
होती है सुबह हसीन और शाम सिंदूरी लगती है।

लहू की हर बूँद तेरे जिस्म की अमानत है।
मेरी सांसों से ज्यादा तेरी सांसे जरुरी लगती है।

तुम बिन बिखर गया हूँ मैं आईने सा जमीं पर।
बस साथ जो तुम हो, ये ज़िन्दगी पूरी लगती है।

जबसे तुमसे दूर हुए हर बात अधूरी लगती है।
हँसना भी महफ़िल में एक मजबूरी लगती है।
वैभव”विशेष”

Leave a Reply