चलो फिर से वर्तमान में आ जायें।

हर तरफ गरीबी है, हर तरफ बेबसी है.
हर तरफ लाचारी है, हर तरफ बेकारी है.
मासूम जनता की, बस यही एक बीमारी है.

देश में हाहाकार है, हर तरफ बेरोजगार है.
दो वक़्त की रोटी नहीं, किस्मत बड़ी बेकार है.
सोचता है दिल यही, कि वो कितना लाचार है.

सोचता था जो कभी, पढ़ लिख कर रोजगार पायेगा.
क्या पता था मासूम को, सब मिटटी में मिल जायेगा?
टूट जायेगा हर सपना, भविष्य बड़ा रुलाएगा.

सोचता है कि वो दिन बचपन के बड़े सुहाने थे.
दादी की कहानियां और मस्ती के फ़साने थे.
जब रोटी के लिए नाकों चने ना चबाने थे.

काश वो बचपन के दिन, लौट के फिर आ जायें!
और हम अपनी मां के आँचल में छुप जायें!
पर ये अब मुमकिन नहीं, चलो फिर से वर्तमान में आ जायें.

निशान्त पन्त “निशु”

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