वक्त कैसे बदलते है

वक्त कैसे बदलते है

सम्पति के पीछे जो दौड़े
रिश्ते-नाते कुछ नहीं होते |

बनि बनाये रिश्ते-नाते
कागजकी ही टुकड़े होते |

जिसे सबको दिखा सके
अपने खातिर बता सके |

‘दूसरोंको कुछ भी हो जाये
अपनी बनें तो चैन मिले |’

जिनेका ये उसके मन्त्र होते
बेवजह तू क्यूँ माथे फोड़ें |

अपनी ढंग से ही जी ले तू
पहले पूछे अपनी मन से तू |

जीवनका ये रीत है यहां के
भूल जाओ सब बस कर्म करो |

देखते जाओ बस वक्त कैसे बदलते है
भरोसा करो दैवपे चक्कर कैसे चलाते है |२|

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